कहानी एक खतरनाक पुल की | A story of dangerous bridge | IndianHorrorStories

कहानी एक खतरनाक पुल की

खतरनाक पुल

आज बहुत ही तनाव भरा दिन था। मैं बहुत ही थक गया था। फिल्म के आखरी scene का shoot था। जब pack up हुआ, हम सब लोग अपना सारा काम निपटाकर set से बहार निकले। रोज़ की तरह ही मैंने सब को शुभ रात्रि कह कर विदा ली और मैं अपने घर के रास्ते निकल पड़ा।

मेरा घर मुख्य रास्ते से थोड़ा अंदर है। तो बस स्टॉप से करीब २० मिनट चल के जाना पड़ता है। मुझे तो आदत है रोज़ की। तो रोज़ की तरह ही मैंने बस पकड़ी। सीट पे बैठते ही मन में खयाल आया, “ज़ोरो से भूख लगी है, आज तो घर पे छोले बने होंगे। भाई आज तो मज़ा आजायेगा खाने पे।” ये ही सोच रहा था के कुछ समय में मेरा स्टॉप भी आ गया और मैं बस से उतरा।

बस स्टॉप पे पूरी तरह से काला अंधेरा था। बस की लाइट थी तब तक दिखायी दिया। पर बस वाला कहा रुकने वाला था मेरे लिए। जैसे ही मैं उतरा, बस निकल गयी।

मैंने सोचा के शायद पूरे एरिया की लाइट गयी होगी। वरना उस रास्ते पे हमेशा लाइट तो होती है। मैं वही खड़ा रहा, और आँखें मसलकर देखने की कोशिश की, के कुछ तो दिख जाये। थोड़ी देर के बाद मुझे धुँधलासा रास्ता दिखाई देने लगा। तो मैंने सोचा, “चलो, अंदाज़े से चले जाता हूँ। यहाँ रुक के कोई फायदा नहीं। इस लाइट का कोई भरोसा नहीं।” और मैं अपने रस्ते पे चलने लगा।

मेरे घर के रास्ते में एक नाला पड़ता है। उस नाले के ऊपर एक खतरनाक पुल है। वह पुल पार करके दूसरी तरफ दो मिनट पे मेरा घर है।

मैं अपने रास्ते पे चल रहा था। थोड़ा संभल कर ही, क्यूँकि कोई साँप या फिर कोई जानवर न आ जाये पैर के नीचे। और थोड़ी देर चलने के बाद मुझे एक रौशनी दिखाई दी। वह रौशनी नाले पे जो पुल है उसके पीछे से आ रही थी। उस रौशनी में मुझे वो पुल साफ़ दिखाई दे रहा था।

मैंने राहत की सांस ली, के चलो थोड़ी तो रौशनी है। और मैं उस पुल की तरफ चलने लगा। मैंने देखा के उस पुल पर दो आदमी खड़े थे। शायद वह बातें कर रहे थे एक दूसरे से। उनके हावभाव से ऐसा ही नज़र आ रहा था।

मैं अपने रास्ते को देख के चलने लगा। दो-तीन कदम चल के मैंने उस खतरनाक पुल की ओर देखा, तो वो दोनों पुल की दूसरी तरफ खड़े थे और बातें कर रहे थे।

फिर से मैं नीचे देखकर चलने लगा। एक मिनट के बाद मैंने फिर से उपर देखा, तो वो दोनों उस जगह पर नहीं, तो पुल के बीच में ही खड़े थे और बातें कर रहे थे।

मुझे ये थोड़ा अटपटा लगा। मैंने सोचा, “ये लोग हर बार उनकी जगह क्यूँ बदल रहे हैं? खैर, मुझे क्या करना है।” यह सोच कर मैं चलने लगा।

फिर मेरे मन में खयाल आया, “कौन होंगे ये दोनों? शायद मेरे इलाके वाले ही होंगे कोई। मैं पुल से ही जाने वाला हूँ, तब पता चल ही जायेगा।”
दूर से बस उनकी काली परछाईं जैसी आकृति ही नज़र आ रही थी। उससे इतना ही पता चल रहा था के वो दोनों कोई यजमान हैं और उनको हावभाव से पता चल रहा था वो कुछ एक दूसरे को बता रहे हैं।

अब मैं पुल के नज़दीक पहुंच गया। मुझे लगा के अब शायद मुझे उनकी आवाज़ सुनाई देगी। पर नहीं, उनकी कोई आवाज़ नहीं आयी। मुझे लगा शायद वो धीरे बात कर रहे होंगे।

वो दोनों अब पुल के बीचोंबीच खड़े बातें कर रहे थे। अब मैंने पुल पे कदम रखा। मैंने सोचा के अब तो पक्का आवाज़ सुनायी देगी। पर नहीं, मुझे वो दोनों ऐसे ही दिख रहे हैं, जैसे दूर से दिख रहे थे, दो लोगों की काली आकृति, और वो बातें कर रहे हैं।

अब मैं डर गया। क्यूँकि उस रौशनी में मुझे पुल और रास्ता एकदम साफ़ दिखायी दे रहा था, पर ये दोनो उसी पुल पे मेरे सामने खड़े हैं, पर वो एक परछाईं की तरह कैसे दिख रहे हैं?

मैंने सोचा, “ये शायद मेरी नज़रों का धोखा हो सकता है, थोड़ा नज़दीक जाऊँगा तो उनकी आवाज़ से पहचान लूँगा उनको और शायद वो नज़दीक जाने पे वो दिख भी जायेंगे।”

मैं आगे पुल पे चलने लगा, और उनके नज़दीक गया। फिर मैं उनके नज़दीक से गुज़रा।

मैं उनसे दूर जा के खड़ा हो गया। मेरे पसीने ही छूट गए, क्यूँकि मैं उनके एकदम पास से गुजरा, फिर भी मुझे उनकी ज़रा सी भी आवाज़ सुनाई नहीं दी जब की वह दोनों लगातार बातें कर रहे थे। और उनका शरीर भी नहीं दिखा, एकदम पास होकर भी वो मुझे एक परछाईं ही नज़र आये।

मैं फटाफट उस पूल से नीचे उतरा और मैं पलटा। तब उन मे से किसी एक आदमी की ज़ोर से आवाज़ आयी, “अब पीछे मुड़कर मत देखना, चल निकल अपने घर पे।”

आवाज़ सुन के मैं बेहद डर गया। मेरे पैर कपकपाने लगें। और मैं अपना बैग लेकर घर की ओर भागा।

मुझे पता नहीं वो दोनों लोग कौन थे। वो कोई इंसान थे या फिर कोई और? ऐसा क्या था उस खतरनाक पुल पे? आज तक किसी ने भी ऐसा कुछ उस पुल पे नहीं देखा था। उस रात के बाद मैंने भी फिर से उनको कभी नहीं देखा। आख़िर ये सवाल, सवाल ही रह गया की “वो कौन थे?”

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