कहानी-एक-अजनबी-की | Indian Horror Stories

कहानी एक अजनबी की

कहानी एक अजनबी की

शर्माजी की इकलौती बेटी, कविता, १० साल की हो गयी। इन १० सालों में शर्माजी ने कभी भी अपनी बेटी को माँ की कमी महसूस नहीं होने दी। कविता की माँ तो उसे जन्म देते ही चल बसी थी।

सुबह कविता रोज की तरह पार्क में खेल रही थी कि अचानक उसे चक्कर आया और वह बेहोश होकर गिर गयी। गनीमत थी कि इतवार का दिन था और शर्माजी घर पर ही थें। कविता को लेकर वो सीधे अस्पताल पहुंचे।

जांच-पड़ताल के बाद डॉक्टर ने दवाइयां दी, जिससे कविता को होश तो आ गया पर साथ ही, डॉक्टर ने कविता को और टेस्ट्स के लिए २ दिन अस्पताल में ही रखने की सलाह दी।

२ दिन के बाद सारे टेस्ट रिपोर्ट आई तो डॉक्टर ने शर्माजी को बुलाकर कुछ ऐसा कहा जिससे शर्माजी के पैरों तले ज़मीन खिसक गयी। डॉक्टर ने बताया कि कविता के दिल में छोटा-सा छेद था, जिसे यदि ज़ल्द नहीं भरा गया तो कविता को ज्यादा दिन तक जिंदा रखना मुश्किल होगा। छेद को भरने के लिए तीन दिन के भीतर ऑपरेशन करना ज़रूरी था और ऑपरेशन के लिए कम से कम दो लाख रुपयों की ज़रूरत थी।

डॉक्टर की बातें सुन शर्माजी की आँखों से आंसू फूट पड़े। तीन दिन के भीतर दो लाख रुपयों का इंतज़ाम करना उनके लिए नामुमकिन था। पत्नी के बाद अब बेटी को भी खोने के लिए वो बिल्कुल तैयार नहीं थे। कविता के अलावा दुनिया में उनका कोई और था भी नहीं। वो अस्पताल से रोते-रोते बाहर निकले और एक कोने में खड़े हो गए।

तभी एक अजनबी उनके पास आया और उनके कंधे पर हाथ रखता हुआ बोला, “भाई साहब, आपको दो लाख रुपये की ज़रूरत है ना, यह लीजिये दो लाख रुपये और अपनी बेटी का ऑपरेशन करवा लीजिये।”

शर्माजी आश्चर्य में पड़ गए। आखिर एक अजनबी उनको पैसे क्यों दे रहा था? उन्होंने अजनबी से पुछा, “आप यह पैसे मुझे क्यूं दे रहे हो?”

अजनबी बोला, “यह पैसे मैंने अपनी बेटी के इलाज़ के लिए जमा किये थें। पर अब यह पैसे मेरे किसी काम के नहीं क्योंकि मेरी बेटी ऑपरेशन से पहले ही चल बसी। यदि इन पैसों से आपकी बेटी की जान बच गयी, तो मुझे लगेगा कि मेरी बेटी मुझे वापस मिल गयी। रख लीजिये इन्हें,” कहते हुए उस अजनबी ने नोटों की एक मोटी गड्डी शर्माजी के हाथ में थमाई और भीड़ में गायब हो गया।

इससे पहले कि शर्माजी उसे कुछ कह पाते वो वहां से जा चूका था।

शर्माजी के पास ज्यादा सोचने का वक़्त नहीं था। इसलिए वो सीधे डॉक्टर के पास पहुंचे और ऑपरेशन के लिए ज़रूरी कागज़ात भरने में लग गएँ।

अगले दिन कविता को ऑपरेशन था। शर्माजी बाहर बैठे ईश्वर को याद कर रहे थें कि तभी नर्स ने उन्हें खुश-खबरी दी कि ऑपरेशन कामयाब रहा। शर्माजी ने राहत की सांस ली। उन्हें ऐसे लगा जैसे ईश्वर ने कविता के साथ-साथ उन्हें भी नया जीवन दे दिया हो।

कविता को अगले दो दिन तक इंटेंसिव केयर यूनिट में रखा जाना था। शर्माजी कविता के रूम के बाहर बैठे थे। तभी उनके ध्यान में उस अजनबी का ख्याल आया, “अरे! मैंने तो उस अजनबी को अभी तक बताया ही नहीं कि कविता का ऑपरेशन हो गया है और वह खतरे से बाहर है। उससे मिलकर उसका धन्यवाद तो दे दूँ और धीरे-धीरे कर उसका क़र्ज़ भी चूका दूंगा,” उन्होंने सोचा।

वो बाहर आयें और अस्पताल के कर्मचारियों से उन्हें मिले एक अजनबी के बारे में वार्तालाप किया । जब कोई भी उस अजनबी के बारे में कुछ नहीं बता पाया तो शर्माजी ने अस्पताल के बाहर जाकर चाय-नाश्ते की दूकान, दवाइयों की दूकान आदि में भी पूछताछ की। पर उसका भी कोई नतीजा नहीं निकला। किसी को भी उस अजनबी के बारे में कुछ पता नहीं था।

थक हारके शर्माजी वापस अस्पताल आ गएँ और एक बेंच पर बैठकर उस अजनबी के बारे में सोचने लगें। तभी उनके दिमाग में एक ख़याल आया और वो चौंक गएँ. उनकी बेटी के ऑपरेशन के बारे में तो सिर्फ डॉक्टर को और उनको मालूम था। फिर उस अनजान व्यक्ति को कैसे पता चला कि ऑपरेशन के लिए दो लाख रुपयों की ज़रूरत थी? आखिर वो अजनबी था कौन? शर्माजी परेशान थें पर उन्हें अपने सवालों का जवाब नहीं मिल रहा था।

एक हफ्ते बाद कविता को अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया। कुछ दिनों बाद शर्माजी के एक दोस्त कविता का हाल-चाल जानने शर्माजी के घर पहुंचे। वो मित्र एक अच्छे चित्रकार भी थे और किसी की भी शक्ल का वर्णन सुन उसका चित्र बना सकते थे। शर्माजी ने अपने दोस्त से उन्हें मिले एकअजनबी का चित्र बनाने की विनती की। कुछ ही देर में मित्र ने हु-ब-हु अजनबी की शक्ल कागज़ पर उतार दी।

अगले इतवार शर्माजी, मित्र की बनायी तस्वीर लेकर, फिर अस्पताल जा पहुंचे और एक बार फिर उस तस्वीर को दिखाकर पूछताछ करने लगे। जब वो चाय की दूकान पर इसी को लेकर बातचीत कर रहे थे तो चाय वाले ने उनकी बात सुन ली और वह तस्वीर भी देख ली जो शर्माजी सबको दिखा रहे थे।

चायवाला उनके निकट आकर बोला, “साहब इधर साइड में आओ, मैं आपको इस आदमी के बारे में सब बताता हूँ,” कहके चाय वाला शर्माजी को एक कोने में ले गया।

चायवाले ने शर्माजी को बताया कि उस अजनबी की बेटी की इसी अस्पताल में मौत हो गयी थी क्योंकि वह सही समय पर रुपयों का इंतज़ाम नहीं कर पाया था। बेटी की मौत को वो बर्दाश्त नहीं कर पाया और कुछ महीनों बाद उसके गम में वह भी दुनिया से चल बसा।

तब से जब भी इस अस्पताल में, किसी छोटी बच्ची के इलाज़ में रुपयों की कमी आती है, तब वह अजनबी पता नहीं, कहाँ से प्रकट हो जाता है और बच्ची के माँ- बाप को रुपये थमाकर वापस गायब हो जाता है।

अब तक वह चार-पांच बच्चियों की जान इसी तरह बचा चूका है।

चाय वाले की बात सुनकर शर्माजी के होश उड़ गए। उन्हें उसकी बातों पर यकीं नहीं हो रहा था, की कैसे एक अजनबी किसीकी इतनी बड़ी मदद कर सकता हैं । पर यकीं करने के अलावा उनके पास और कोई चारा भी नहीं था। “क्या जो चाय वाला बोल रहा था, वह सही था? क्या ऐसा मुमकिन था?” शर्माजी के दिमाग में कई सारे सवाल एक साथ चल रहे थे।

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